क्या क्या चाहता हूँ

आज खोल दो ज़ुल्फें कि मैं बहकना चाहता हूँ

फैला दो आँचल हवाओं मे कि मैं महकना चाहता हूँ

जी भर के बिखेर दो मुस्कान हर तरफ

इनके मधुर संगीत पर मैं भी थिरकना चाहता हूँ

तुम्हारी आँखें देखी थी झील सी, तस्वीर मे एक दिन

दिल का शिकारा लेकर इसमे टहलना चाहता हूँ

कभी तो रूबरू हो लो कि खुश किस्मत ही समझेंगे

दीवाना हूँ मैं अपनी किस्मत बदलना चाहता हूँ

कल आई थी ख्वाबों मे और बातें बना कर चल दी

बैठो पास कि तुम्हारी बातों मे उलझना चाहता हूँ

तेरे इशारों पर चला जब से, लोग कहते हैं आवारा

दे दो ठिकाना दिल मे कि मैं सुधरना चाहता हूँ

चलो छोड़ो यही कह दो कि तुम्हारे बारे मे सोचूँगी

जो सोच लो इतना तो फिर क्या चाहता हूँ

न रोको मेरी चाहत को कि आज बरसात सी होगी

बस तुम पूछ लो मुझसे कि क्या क्या चाहता हूँ

प्रणय

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