तहज़ीब थी उनकी

वो हम से रूबरू तो हुए पर नज़रें न मिल पाईं

ये किस्मत थी मेरी या तहज़ीब थी उनकी

सजदा किया हमने वो धीरे से मुसकाईं

ये जन्नत थी मेरी या तहज़ीब थी उनकी

 

कभी वो पर्दों के किनारों से बस देख लेते थे

एक मुस्कान प्यारी सी दिल से फेंक लेते थे

इत्तेफाक से टकरा गए एक दिन राह मे

वो कहना चाहते थे कुछ पर जुबां न कह पाई

ये चाहत थी मेरी या तहज़ीब थी उनकी

 

वो महफिल मे न कह सके, हालात की शिकवा

चाँदनी रात मे न कह सके, उस रात की शिकवा

दिलों ने सब कहा और सब सुना, किस बात की शिकवा

मंज़िल तो एक थी बस राहें न मिल पाई

ये फितरत थी हमारी या तहज़ीब थी उनकी

 

प्रणय

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