तो फिर वही होता जो मंजूरे अदा होता

अगर उनके पास कोई प्यारा सा दिल होता

या उनका दिल नहीं पत्थर से बना होता

या फिर उस पत्थर पर कहीं प्यार लिखा होता

तो फिर वही होता जो मंजूरे अदा होता

 

चंद तारे तोड़ कर तो हर आशिक लाता है

कोई पत्थरों को जोड़ कर ताज महल बनाता है

कहीं परवाना शमा के आगोश मे जाता है

कोई होंश खो देता है, कोई होंश मे आता है

अगर इन सब का हासिल थोड़ी सी वफा होता

तो फिर वही होता जो मंजूरे अदा होता

उन्हे देख के दिल थामा फितरत है हमारी ये

दीदार-ए-हुस्न उनका शिद्दत है हमारी ये

चाहत है, ज़रूरत है, आदत है हमारी ये

तू और की हो जाए लानत है हमारी ये

बस तूने भी इसी तरहा ये हम से कहा होता

तो फिर वही होता जो मंजूरे अदा होता

प्रणय

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