नज़रें तुम्हारी बुरी और पर्दा मैं करूँ !

अभी अभी किसी ने कहा कि रेखा पार न करो
अभी अभी किसी ने कहा कि यूँ सिंगार न करो
किया है किसी और ने और जुर्माना मैं भरूँ
नज़रें तुम्हारी बुरी और पर्दा मैं करूँ

रेखा पार मैं करूंगी तो तुम रावण बनोगे
चलो ना मांगती मैं सोने का हिरन
तुम राम बन सकोगे ?
दुनिया का डर तुमको और अग्नि में मैं जलूं
नज़रें तुम्हारी बुरी और पर्दा मैं करूँ

कभी डायन बुलाया मुझको मै सहती रही
दहेज़ की आग में जलाया मुझको मै सहती रही
इज्ज़त दे के दुनिया माँ मुझे कहती रही
फिर गाली बनाया मुझको मै सहती रही
बेटा चाहिए दुनिया मे, गर्भ मे मैं मरूं
नज़रें तुम्हारी बुरी और पर्दा मैं करूँ

चलो माना की हसरत है मेरी भी आसमानों की
कब तक जियूं मैं जिंदगी बस बेजुबानों की
कभी पतंग बनना चाहती थी उडती हुई
बस पिंजरे का पंछी बन कर मै रह गयी
ये दुनिया मेरी भी उतनी ही है, फिर क्यों मै डरूं
नज़रें तुम्हारी बुरी और पर्दा मैं करूँ

प्रणय

10 Comments

  1. बहुत सुन्दर रचना है प्रणय ….सच है करे कोई और भरे कोई … अपनी नीयत में खोट और ठीकरा औरों के सर …. आपने नए साल की शुरुआत में इतनी सशक्त रचना लिख कर जो आगाज़ किया है …. मन से दुआ करती हूँ …. कि आपकी यह रचना …. चित मै जीता पट तू हारा के अंदाज़ में हर बात के लिए नारी को उपदेश देने वाले लोगों की सोच को उनके नज़रिए को बदल सके …. ईश्वर आपको सुखी रखें … नव वर्ष शुभ हो …

  2. Pranay bhai wrote this poem at the time “16 dec delhi case” .. Bloggers can u belive he made this poem in 15 mins .. being his sis m proud of him .. the words he select is direct from his heart.. gr8 work bro!!

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