हर्ज़ क्या है !

दिल में है एक दर्द पर ये दर्द क्या है
कोई हम को ये बता दे मर्ज़ क्या है

गर्म सांसों से कहा अलविदा उसने
ये पता ना, देता सुकून को सर्द क्या है

एक वो थी, एक है ये जिंदगी
शिकवा मिली दोनों से तो फिर फर्क क्या है

न वादा ना कसम कोई कभी उसने निभाई
ना वो जान पाई कि वफ़ा का फ़र्ज़ क्या है

न कोई प्यार करता है किसी मतलब की खातिर
न कोई पूछता है कि बता दे शर्त क्या है

बंधन दिलों का एक बार जो जुड़ गया तो
यूँ तोड़ कर फिर जोड़ने का तर्ज़ क्या है

क्या जान पाया कोई इश्क के उसूलों को
आखिर किताब-ए-मोहब्बत में दर्ज क्या है

हां छोड़ कर गयी थी वो ही तो एक दिन
फिर बताओ तुम पर कोई क़र्ज़ क्या है

भूल कर तुम को अगर वो खुश बहुत है
तुम भी लगा लो कहकहे यूँ हर्ज़ क्या है

प्रणय

कुछ ख़ास नहीं बदला

मेरा झूला टूट गया है, पुराना लकड़ी का
जो था मेरे आँगन में नीम के नीचे
पीछे का मैदान जहाँ हम दिन भर खेलते थे
वो बूढ़े दादा जो चश्मा सम्हालते हुए
लकड़ी के सहारे खड़े होकर हमारा खेल देखते थे
अब कुछ नहीं है वहां
और लोग कहते हैं कुछ ख़ास नहीं बदला

हमारे छोटे-छोटे हाथों में दस-बीस पैसे
जो बचा कर रखे थे कि दोपहर में कुल्फी वाला आएगा
वो झाड़ियों के झुण्ड में सेतूस के पेड़ के नीचे
कुछ पके सेतूस मिलने की ख़ुशी थी कहीं
अब कुछ नहीं है वहां
और लोग कहते हैं कुछ ख़ास नहीं बदला

वो छुपम-छाई में हांडी फोड़ने के लिए
एक दुसरे की कमीज़ बदलना
कभी गीली रेती में सुरंग बना कर हाथ मिलाना
वो रात के अँधेरे में लोगों के पतरों पर पत्थर बजाना
और हाँ वो तालाब जहाँ ढेर सारे कमल खिलते थे
हम दिन भर जहाँ बैठ कर बस बातें करते थे
अब कुछ नहीं है वहां
और लोग कहते हैं कुछ ख़ास नहीं बदला

वो लड़की जिसे मैं देख कर बस हँस दिया करता था
आगे के दो दांत जो नहीं थे उसके
और गर्मी की रातों में वो छतों की महफ़िल
कभी निभाया नहीं वो सुबह जल्दी उठने का वादा
कभी साईकिल से करतब दिखाते थे सड़कों पर
कभी गिरते तो हँसते थे अपने ही ऊपर
अब कुछ नहीं है वहां
और लोग कहते हैं कुछ ख़ास नहीं बदला

प्रणय

कहीं कोई तमन्ना है !

कहीं कोई तमन्ना है न जाने कौन सी है वो
शायद है कोई पत्थर या केवल मोम सी है वो
वो लम्हा है या है पल, या इंतज़ार सदियों का
कुछ तो है शोर फिर भी मौन सी है वो

मेरे कहने पर वो थोड़ा मचल सी जाती है
उकसा दो जो सुनने को तो बस गुनगुनाती है
ज़मी पर भटकती है फिर भी व्योम सी है वो
कहीं कोई तमन्ना है न जाने कौन सी है वो

कभी वो खुल के बिखरेगी जैसे पराग फूलों का
दिल को छुएगी तोड़ कर बंधन उसूलों का
कोई हलचल उठा दे जैसे रोम-रोम सी है वो
कहीं कोई तमन्ना है न जाने कौन सी है वो

वो उड़ने को तडपती है, वो महुए सी महकती है
वो सागर की भी मस्ती है, जो लहरों सी छलकती है
मेरी मंजिल, मेरा प्यार, मेरी कौम सी है वो
कहीं कोई तमन्ना है न जाने कौन सी है वो

प्रणय