एक जगह जो रह गयी उसे आज़माते हैं

चलें तोड़ें बंधन, कहीं घूम के आते हैं
एक जगह जो रह गयी उसे आज़माते हैं

रख लेना सामान कुछ दैनिक कोई पुरानी किताब
कुछ सिक्के भी रखलेना खरीदने को ख्वाब
कह देना आस-पड़ोस में , जा रहे हैं
कुछ तीन या चार पलों में वापस आरहे हैं
मन घुमक्कड़ उठ चला है लाद कर बेग पीठ पर
जा बैठा है शान से तमन्नाओं की सीट पर

सब कुछ है फिर भी कुछ तो ले आते हैं
हम भी कहीं कोई निशाँ छोड़ आते हैं
एक जगह जो रह गयी उसे आज़माते हैं

देखेंगे दुनिया और कुछ उतार-चढाव इसके
ये भी देख आयेंगे, चाँद पर हैं पाँव किस के
जहाँ दोस्त भी होंगे कुछ अपने भी होंगे
जो देखे थे नींद में वो सपने भी होंगे
जहाँ बादल भी हाथों के निचे आ जाएँ
जहाँ समंदर बाहें फैला के बुलाए

चलो राहों के पीछे कुछ लकीरें बनाते हैं
पीछे आने वालों को किस्से सुनते हैं
एक जगह जो रह गयी उसे आज़माते हैं

चलो चलते हैं वहां जहाँ पतझड़ में भी फूल खिलते हों
जहाँ बच्चों की मुस्कान, बड़ों से प्यार मिलते हों
सब जगह खुशियाँ फैली है चलो कुछ बटोर लायें
कुछ पहाड़ों की खामोशियाँ कुछ सागर का शोर लायें
सुना है बहुत खुबसूरत है जग ये
बहुत लम्बा सफ़र है और छोटे हैं पग ये

तो चलो हम भी कोई short cut अपनाते हैं
इन पलों को कहीं दीवारों पर सजाते हैं
एक जगह जो रह गयी उसे आज़माते हैं
प्रणय

This post is written as an entry for the Around the world with Expedia contest, held by IndibloggerExpedia.

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जब संघर्ष हो चाहत तो निश्चित है जीत

हरी हरी तृण से औंस का जल खो गया
ढूंढ़ता था जो भंवर को रोज़ माझी
देखता हूँ आज माझी का किनारा खो गया

लहरों के संग्राम में, शांति के उस धाम में
पी गया वो विष अमृत एक ही जाम में
वो तूफ़ान से लड़ता है, फिर खामोश सा बढ़ता है
उम्मीदों की पालों से वो मौजों पे जा चढ़ता है
ललाट की त्योरियाँ आगाज़ करती है
हर धड़कन उसकी चाह पर विश्वास करती है
कदम न थर्राते न रुकते न डरते हैं
निगाहों में समाकर उसकी, मौसम बदलते हैं
धेर्य की सीमाएँ फिर यूँ टूटती जाती
कोई मंजिल भी उसके हासिल से कैसे बच पाती
मंथन कर वो खंडन कर वो आगे बढ़ रहा देखो
हर संघर्ष उसका कह रहा उसकी तरफ देखो
इस वीराने का शोर उसको मदहोश करता है
हर प्रतिरोध रगों में नया जोश भरता है
वह करता रहा क्षमता की अपनी धार को पैनी
पाषाण भी बनता है मूरत सह ले जो छैनी
आदत नहीं करने की परिणाम का विचार
मुस्कुरा कर कर लिया समर को स्वीकार
युद्ध था वो अदभुत और कल्पनातीत
जब संघर्ष हो चाहत तो निश्चित है जीत
प्रणय

प्रणय दिवस

ये प्रणय दिवस की सुबह प्रणय
ये क्षितिज और सूरज का प्रणय

ये देख-देख मन हर्षाता
हर कोई आज तो है भाता
ये फूल और भंवरे का प्रणय
ये तट से है लहरों का प्रणय

हर कोई प्रफुल्लित, आनन्दित
मुस्कान है हर चेहरे पर उदित
ये चकोर और चंदा का प्रणय
ये प्यासे और पानी का प्रणय

ह्रदय की संतुष्टि से ऊपर
मन के अरमान तो हैं नभ पर
ये सीप से स्वाति का प्रणय
ये धागे से मोती का प्रणय

ये सृष्टि का है रचनाकार
तुमको मुझको दिया आकार
ये कुम्हार से चाकी का प्रणय
ये हाथों से माटी का प्रणय

ये जिज्ञासा, ये उत्सुकता
मन की मासूम सी व्याकुलता
ये मन से है एक मन का प्रणय
ये ह्रदय से एक ह्रदय का प्रणय

ये बातों से बातों का प्रणय
ये आँखों से आँखों का प्रणय
ये अधरों से अधरों का प्रणय
ये जीवन से जीवन का प्रणय

ये सत्य, भेद या है विस्मय
सृष्टि का आरम्भ प्रणय
और सृष्टि का अंत प्रणय
प्रणय

शांति रखो ना यार

हम गुस्सा है
कभी खुद पर
कभी अपनों पर, कभी दूसरों पर
कभी भगवान् पर कभी किस्मत पर
हम चिल्लाते हैं चीजों पर अक्सर बार-बार
और फिर भी सब से कहते हैं, शांति रखो ना यार

हम नेताओं से गुस्सा हैं,भ्रष्टाचारों से गुस्सा हैं
हम मंदिर के पास पड़े कुछ लाचारों से गुस्सा हैं
पडोसी के कचरा फेंकने की आदतों से गुस्सा हैं
सड़क पर चलने वालों की पिचकारी से गुस्सा हैं
बिजली कटने से गुस्सा हैं,टायर फटने से गुस्सा हैं
चाबी घुमने से गुस्सा हैं, बच्चों के न सुनने से गुस्सा हैं

हम ठोकर लगने पर भी गाली बकते हैं लगातार
और फिर भी सब से कहते हैं, शांति रखो ना यार

हम गुस्सा हैं
बस में कभी सीट के लिए,लाइन में कभी टिकिट के लिए
खुल्ले के लिए ऑटो वाले से,ट्राफिक जाम में आगे वाले से
कभी बीवी की तकरार से, कभी क्रिकेट टीम की हार से
कभी exam के result से, कभी assignment की मार से
कभी गर्लफ्रेंड के फ़ोन ना उठाने से, कभी दोस्तों के झूठे बहाने से
कभी दाल में नमक कम होने से, कभी सब्जी में ज्यादा नमक मिलाने से
कभी पकिस्तान की हरकतों से , कभी जेल में बंद कसाब से
कभी भविष्य की चिंता से, कभी अधूरे छूटे ख्वाब से
किसी news channel की बकवास से, dry day पर लगी प्यास से
कभी डकबर्थ लुईस के rule से, कभी न्यूटन, पाइथागोरस और गॉस से

पहले धैर्य,धीरज,शांति और ढूंढ़ ले थोडा प्यार
फिर कहेंगे मिलकर सब, शांति रखो ना यार
प्रणय

अजन्मी बेटी की आवाज़

माँ मुझको जीवन देदे तू ,मैं तेरा जीवन बन जाउंगी
देखना इन छोटे क़दमों से आसमान तक छा जाउंगी

देख भरोसा कर के तो माँ,एक और एहसान तो कर
अधिकार कब माँगा मेने,एक छोटा सा दान तो कर
तेरा ही हिस्सा हूँ मैं माँ, अलग कहाँ रह पाऊँगी
माँ मुझको जीवन देदे तू ,मैं तेरा जीवन बन जाउंगी

कहेंगे सब आई है लक्ष्मी, ये वचन भी पूरा कर दूंगी
दो रोटी ही दे देना बस, बाकी पेट प्यार से भर लुंगी
किस्मत तेरी न होगी रुसवा, मैं किस्मत को भी मनाउंगी
माँ मुझको जीवन देदे तू ,मैं तेरा जीवन बन जाउंगी

डर तेरा दुनिया से है ना, चल मैं दुनिया बदलूंगी
मुझ पर दुनिया की नज़रों को, तेरी नज़रों सा कर दूंगी
फिर जग होगा रहने के लायक, और मैं इसमें रह जाउंगी
माँ मुझको जीवन देदे तू ,मैं तेरा जीवन बन जाउंगी

किसी को तो शुरुआत करनी होगी, चल शुरुआत तुझी से करें
मै होउंगी ना साथ तेरे माँ, फिर हम क्यों किसी से डरें
दो परिवार की इज्ज़त हूँ माँ, हमेशा बढती जाउंगी
माँ मुझको जीवन देदे तू ,मैं तेरा जीवन बन जाउंगी

उस दूध के कटोरे से बचा लेना माँ,मुझे डूबने से डर लगता है
ना जन्मते ही मुझे ज़मीन को देना,उन रूढ़ियों में दम घुटता है
मुझे कूड़े के हवाले ना करना माँ, तेरी गोद को नहीं लजाउंगी
माँ मुझको जीवन देदे तू ,मैं तेरा जीवन बन जाउंगी

अब सोच तू खुद ही क्या करना है, मैं छोटी होकर तुझे क्या सिखाऊ
तेरा दिल खुद ही निर्णय लेगा, मैं क्यों इसके आड़े आऊ
तेरी ममता मुझ से ही है, इसके साथ ही ख़त्म हो जाउंगी
माँ मुझको जीवन देदे तू ,मैं तेरा जीवन बन जाउंगी
प्रणय

इंसानों की भीड़ में हम इंसान ढूंढते है

इंसानों की भीड़ में हम इंसान ढूंढते है
खुद को ही खो के अपनी पहचान ढूंढते है

दिल में छिपे है शोर सारे ज़माने के
हम थोड़ा सा सुनसान एक जहान ढूंढते है

कुछ मस्तियाँ रखी है मुट्ठी में लुटाने को
जो लूट ले इनको वो नादान ढूंढते है

जहाँ तक गयी नज़रें लगे सब जाने-पहचाने
हर चेहरे में शख्स एक अनजान ढूंढते है

तुम्हारे चेहरे की मुस्कान कहीं खो गयी है शायद
हर कहीं अब वही मुस्कान ढूंढते है

सब ही तो ढूंढते है कुछ न कुछ यहाँ पर
हम ही नहीं अकेले जो सरे-आम ढूंढते है
प्रणय