मेरे गाँव की प्यारी याद

शहरों की वो रात उलझी-उलझी सी बात
एक तन्हाई के साथ मेरे गाँव की प्यारी याद

मेरे गन्ने के वो खेत ,मोटी मारसाब की बेंत
हुडदंगी वो बालू रेत ,जंगल के वो लाल डकैत

तोते के पिंजरे की कैद,लड़का-लड़की में वो भेद
छत के छोटे-छोटे छेद, दादाजी के बाल सफ़ेद

गाँव के पत्थर की वो गलियां , लाल गुलाब की वो कलियाँ
दादी अम्मा की वो दलिया , मुट्ठी भर वो मुन्गफलियाँ

सुबह-सुबह की ताज़ा सैर,मेरी इमली मेरे बेर
बाड़े में भूंसे का ढेर,मेहंदी की झाड़ी का घेर

पूजा के दिए की बाती,मेरी हुल्लड़ मेरे साथी
बट पर बंधा वो रामू हाथी,ताल के मेंढक वो बरसाती

सातिया मंडी हुई रंगोली ,अपने ठेठ गाँव की बोली
होली की वो लम्बी टोली, ठंडी कुल्फी भांग की घोली

मयखाने सी वो चौपाल,ठन्डे पानी की वो खाल
मच्छी का वो टूटा जाल,पके अमरूदों की वो डाल

दौड़ती रेल का धुआं , वो सरपंच का कुआँ
दिवाली रात का जुआं,रोते बच्चे की उँआ

सोयाबीन के पीले फूल,नवराते की जलती चूल
सावन के झूले की झूल,सेठ का ब्याज किसान का मूल

रात में सियार का शोर ,सावन में वो नाचता मोर
चंदा तलाशता वो चकोर,मक्के की रोटी का कोर

खुल्ले आसमान के तारे,ऊँचे झरने की वो धारें
नानी के वो शक्कर पारे,छोटी नाव वो नदिया किनारे

१२,१३ का वो पहाडा,सर्दी की रातों में काड़ा
गाय,भेंसों का वो गाड़ा,नंदू पहलवान का पाड़ा

बसंत में कोयल की कूक,चूल्हे में फूंकनी की फूंक
सुबह सुबह की ताज़ा भूख,बापू का जवाब दो टूक

अँधेरे में छुपम छाई ,दोपहर की झूठी पढाई
टीले के पीछे की खाई,जाड़े में वो गरम रजाई

असली घी की दाल बाटी,खेतों की वो काली माटी
लम्बी चोकीदार की लाठी,नदी के पानी में वो गुलाटी

खेत के बीच वो काक-भगोड़ा,जमींदार का लंगड़ा घोड़ा
हल में बैलों का वो जोड़ा और रिमझिम पानी थोड़ा-थोड़ा
————————————————————-क्रमशः
प्रणय

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उसने मेरी खातिर………..

कोई दुखी है मेरे लिए इसलिए मै अक्सर खुश रहता हूँ
कोई रोता है मेरे लिए इसलिए मै हँसता हूँ
कोई चुप है मेरे खातिर इसलिए मै बोलता हूँ
कोई सिर्फ मुझे चाहता है इसलिए मै सब को चाहता हूँ
कोई पल-पल मेरे लिए मरता है इसलिए मै पल-पल जीता हूँ

ताकि उसकी आशाओं को मंजिल मिले
उसकी खामोश लहरों को साहिल मिले

उसने मेरे लिए आँखें बंद की है इसलिए मै इस जहाँ को देखता हूँ
उसने मेरे लिए छोड़ा है सब कुछ इसलिए मै दुनिया को साथ ले के चलता हूँ
उसने मेरी खातिर अपनी बाहें बांध रखी है इसलिए मै बाहें फैला के उड़ता हूँ
उसने मेरी खातिर हर राह बंद कर ली इसलिए मै मुमकिन हर राह खोलता हूँ
उसने अपनी हर ख्वाहिश को दबाया है इसलिए मै सितारों की ख्वाहिश रखता हूँ

ताकि उसकी इच्छाओं की लौ को उजाला मिले
उसके बाग़ का हर फूल फिर से खिले

उसने मेरी हर मुसीबत को ले लिया ताकि मै गा सकूँ ख़ुशी से
उसने हर तूफ़ान को अपने सीने में जगह दी ताकि मै जान सकूँ सुकून क्या चीज़ है
उसने मेरी राह के हर पत्थर को काट दिया ताकि मै बह सकूँ एक नदी की तरह
उसने खुद को गहराइयों में रखा ताकि नींव मजबूत हो मेरी ऊँचाइयों की

ताकि मुझे वो सब मिले जो उसे न मिला
मै वो जिंदगी जियूं जो वो न जी सका
प्रणय

एक चाय में बिक जाते थे !

कुछ दिन ही पहले की बात हो जैसे
दोस्तों से मिलते थे इठला के ऐसे
वो नुक्कड़ चौराहों पर सजती थी महफ़िल
वो खुरापाती दिमाग वो मस्ती भरा दिल
यूँ तो दोस्तों की कीमत करोडो में लगाते थे
पर उन्ही के लिए एक चाय में बिक जाते थे !

exam की रातों में बातों ही बातों में
जब यूँ नींद के हालत बन जाते थे
जेबें सबकी खली,खातों में कंगाली
पुराने पेंट की जेबों में सिक्के ढूंढे जाते थे
फिर चाय की चुस्की में जन्नत थी मिलती
टेंशन छोड़ कर रात को फिर गाने गाये जाते थे
highway के किनारे जब भुट्टे सीक जाते थे
उस माहौल के लिए हम एक चाय में बिक जाते थे !

याद है वो कमिटमेंट हर सेम की शुरुआत का
जब खुद से पढाई के कुछ वादे किये जाते थे
हर बार नए जोड़े कैंटीन के पीछे
और कुछ तनहा आँख सेकते मिल जाते थे
कभी चाय के लिए लड़ना कि किसकी है बारी
फिर एक-एक रूपये के चंदे लिए जाते थे
अपनी वाली का birth day भी होता था अगर
तो उसी के लिए बस चाय में बिक जाते थे !

जब होटल कि चाय में स्वाद नहीं आता
तो ढाबे कि फीकी भी शौक से पी जाते थे
चाय बनाने का कभी जब आता था मौका
chit निकाल कर फिर फैसले लिए जाते थे
जब तारीफ़ नहीं मिलती तो होते थे गुस्सा
जो तारीफ़ कभी मिल जाती तो झांकी जमाते थे
वो चाय तो अब भी है पर वो लम्हें कहा है
जिन लम्हों के लिए हम एक चाय में बिक जाते थे !
प्रणय

यूँ तो मै नहीं डरता

मुझे डर है उन चीजों का जो शायद हो सकती है
यूँ तो मै नहीं डरता

मुझे डर है मै कहूँगा और वो रूठ जाएगी
मुझे डर है मेरे इज़हार को वो समझ न पायेगी
मुझे डर है ये बात दूरियां बढ़ा जाएँगी
यूँ तो मै नहीं डरता

मुझे डर है ये रास्ता मंजिल के लिए गलत है
मुझे डर है फिर भी मेरी चलने की चाहत है
मुझे डर है शायद मुझे डरने की आदत है
यूँ तो मै नहीं डरता

मुझे डर है मै उम्मीद पर खरा न उतरूंगा
मुझे डर है कोई साहिल मै हासिल न करूँगा
मुझे डर है मेरी हालत मै समझा न सकूँगा
यूँ तो मै नहीं डरता

मुझे डर है भीड़ मै कही खो जाने का
मुझे डर है जज़्बात के आँखें भिगो जाने का
मुझे डर है हर बात में सारे ज़माने का
यूँ तो मै नहीं डरता
प्रणय