ये तो रोज़ का है …………..

देर शाम को सूट-बूट में घुमने निकला मेला
दोस्त सारे जब नहीं मिले तो चल दिया में अकेला
धुन में चलते पीछे से टकराया एक ठेला
लड़की से मिली आँख हमारी और प्यार हो गया पहला
बस क्या था फिर तो उसके पीछे जाने की ठानी
दिल को बहुत रोका मेने पर बात एक न मानी
पास में उसके चल रहे थे हट्टे-कट्टे पापा जी
उसके पास ही खड़ी हुई थी एक मोटी सी माँ जी
उसके पास खड़े होने का कुछ साहस तो जुटाया
उसी समय उसका तगड़ा सा भाई वहां पर आया
अब जैसे ही हमने थोड़ी उस पर नज़र गढ़ायी
पीछे से एक बाबा जी ने साईकल हमसे भिड़ाई
लंगड़ाते-लंगड़ाते चले अब थोड़ी सी आगे
इंतज़ार था की कब किस्मत मेरी जागे
जिस दूकान पर वो रूकती थी उसी पर हम जाते थे
जो आर्डर उसने करवाया, हम भी मंगवाते थे
पीछा करते करते उसका जेब हो गयी खाली
अब आर्डर न करना, वरना धोनी पड़ेगी थाली
और कुछ देर बाद जो उसने देखा हंस के मुड़कर
सोचा अपनी बात बन गयी इतनी देर से चल कर
उसकी तरफ देख कर हमने एक आँख मिचकाई
जैसे ही कहा उसने पापा से अपनी शामत आई
शेर जैसी ये जनता अपने ऊपर गुर्रायी
अब क्या था खड़े-खड़े ही हो गयी पब्लिक कुटाई
लंगड़ाते-लंगड़ाते हमने घर तक दौड़ लगायी
इन हसीन लड़कियों से तो हमने तौबा खाई
दुसरे दिन जो सूट-बूट में हम चले टहलने
फिर एक लड़की को देखा और पीछे लग गए चलने
पिछली बार की कहानी फिर से आज दोहराई
आदत से मजबूर है ये तो रोज़ का है भाई

प्रणय

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