कभी तो दुनिया को मुट्ठी में भर के देखो

कभी दिल नहीं किया,दो पंक्तियाँ लिखने का ?
कभी दिल नहीं किया, पेन्सिल लेकर काग़ज पर दुनिया उतारने का ?
कभी दिल नहीं किया, अपनी आवाज़ को हर तरफ गुंजाने का ?
कभी दिल नहीं किया, किसी पल को हमेशा के लिए संजोने का ?

कभी अपने आँगन में पौधों को पानी तो दिया होगा ?
कभी गिटार के तारों पर ऊँगली से कम्पन्न तो किया होगा ?
कभी बैठे हुए फुर्सत के पलों में
अख़बारों में भरे होंगे कोई शब्दों के खेल ?
कभी प्याज,टमाटर और निम्बू के साथ
दोस्तों के लिए बनाई होगी चटपटी भेल ?
हाँ तुमने पतंग तो उड़ाई होगी जी भर के ?
या कभी किशोर के गाने सुने होंगे फुल कर के ?

नहीं तो कम से कम ये तो किया होगा
खाली सड़क पर तेज़ रफ़्तार का मज़ा तो लिया होगा ?
मुझे यकीन है दोपहर की नींद तुम्हे कुछ भाती होगी
यार सिनेमा हाल में सीटी बजाना तो आती होगी ?
कभी रांगोली बनाई है कल्पना के रंगों से ?
या नाचे हो मस्ती में थकी हारी टांगों से ?

कभी खोजी होगी दुनिया किताबों के पन्नो में ?
नहीं तो कभी सोये होगे गेहूं,मक्के या गन्नो में ?
कभी संजोई है कुछ टिकटें, कुछ सिक्के पुराने ?
या लिखें है अपनी डायरी में कभी गुजरे ज़माने ?
कहीं दोस्तों के साथ कभी महफ़िल सजाई थी ?
कभी खेल के मैदान में शर्तें लगाई थी ?

हाँ किसी मूवी के लिए पागल तो हुए ना ?
या किसी मंदिर की भीड़ में भगवान तो छुए ना ?
कभी बेग उठा के घुमने तो निकले ही होगे ?
कभी नदी के ठन्डे पानी में तो उतरे ही होगे ?
अगर ये भी नहीं किया तो अब ये कर के देखो
कभी तो दुनिया को मुट्ठी में भर के देखो
प्रणय

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तेरी मुस्कान को भी तब रोना तो आया होगा

तुझे जब भी मेरे अश्कों ने हंस के बुलाया होगा
तेरी मुस्कान को भी तब रोना तो आया होगा

जाते हुए तुझे मैं अलविदा न कह सका
तुने मेरी तरफ देख कर हाथ तो हिलाया होगा

क्या अहमियत थी तेरी मैं तब न जानता था
पर तुझे मेरा ख्याल हर दम ही आया होगा

क्या रह गया हाथों में बस पुरानी एक तस्वीर
तुने तो हाथों से मेरा चेहरा सहलाया होगा

बस एक कंप-कंपी है,सोच कर तेरे गम को
मैं समझ न सका जिसको, तुने तो बताया होगा

तेरी तनहाइयों को मेने समझा पागलपन
कोई पागलपन तब मेरे दिल पर छाया होगा

जो चाहत थी आख़री, पूरी न कर सका
सपने में कभी तुझको सीने से लगाया होगा

मेरे नसीब में शायद सब कुछ था सिवा तेरे
सोचता हूँ किस पल खुदा ने किस्मत को बनाया होगा
प्रणय

मेरी किस्मत अच्छी थी !

मेने पानी चाहा, मुझे सुखा मिला
ज़रा खोदा, सोता मिला
मेरी किस्मत अच्छी थी !

मेने दिन चाहा, मुझे रात मिली
ढूंढा तो मिली जुगनुओं की रौशनी
मेरी किस्मत अच्छी थी !

मेने ऊंचाई चाही, मिली गहराई
पर मेरी नज़रों को आसमान मिला
मेरी किस्मत अच्छी थी !

मेने फूल मांगे ताकि राहें आसान हो
मुझे कांटें मिले ताकि मैं हर राह पर चलना सीख लूं
मेने पंख चाहे ताकि मैं आसमान की हदों को तोड़ सकूँ
मुझे होसले मिले ताकि मैं नया आसमान बना लूं
मेने हर चीज़ मांगी जिस से मेरा जीवन खुशहाल हो
मुझे सिर्फ जीवन मिला ताकि मैं हर चीज़ से ख़ुशी पा सकूँ
मेरी किस्मत अच्छी थी !

एक छोरी गोरी गट्ट

एक छोरी गोरी गट्ट, उसके गाल लाल चट्ट
हैं आँखें नीली नट्ट, हमको पसंद आ गयी फट्ट

इतराती, शर्माती है ,नदिया सी लहराती है
लटके,झटके,नखरे और कितने भाव दिखाती है
होगी वो कोई सोणी कुड़ी मै भी पंजाबी जट्ट
एक छोरी गोरी गट्ट,हमको पसंद आ गयी फट्ट

उसका भाई है हट्टा-कट्टा रामू पहलवान का पट्ठा
एक जेब में रामपुरी है एक में देसी कट्टा
बाप है उसका मोटा तगड़ा और काला कट्ट
एक छोरी गोरी गट्ट,हमको पसंद आ गयी फट्ट

उसकी जुल्फें काली-काली,उसकी सोने की वो बाली
उसकी खिड़की की वो जाली,उसकी मीठी-मीठी गाली
पर मंदिर में धीरे-धीरे राम-राम की रट्ट
एक छोरी गोरी गट्ट,हमको पसंद आ गयी फट्ट

मदिरा सी वो छलक-छलक,मिल जाये उसकी एक झलक
जब पर्दा करती है पलक,लगती है वो सबसे अलग
पूछा उससे हाल तो शरमा के कहती है हट्ट
एक छोरी गोरी गट्ट ,हमको पसंद आ गयी फट्ट
प्रणय

आत्महत्या

एक बार एक मोटे व्यक्ति को आत्महत्या की सूझी
उसने एक ऊंची बिल्डिंग खोजी
बड़ी मुश्किल से वो ऊपर तक चड़ा और कूद पड़ा
जब उसको आया होंश तो दिल में भरकर जोश
उसने नर्स से पूछा मैं यहाँ कैसे आया
नर्स ने कहा एक भिखारी आपको यहाँ लाया
भिखारी के कारण आप तो बच गए
पर आप जिन पर कूदे थे वो चारो दब कर मर गए

इस पर भी उस व्यक्ति ने नहीं मानी हार
उन चारों का कर के अंतिम संस्कार
सोचा नींद की गोली खाकर मर जाऊं
बहुत हो गया अब तो कुछ कर जाऊं
इस तरह मामला तो हो गया था सेट
पर सरकार ने दवाइयों पर लगा दिया वेट
दिल में लेकर दुःख उसने किया गंगा की और रूख
फिर सोचा गंगा को क्यों अपवित्र करूं
इस से तो अच्छा ट्रेन के निचे आकर मरूं
इसलिए उसने प्लेटफ़ॉर्म की और कदम बढाया
पर रेलवे पुलिस के हाथों बिना टिकिट पकडाया

पुलिस से छूट कर वो गया घर
बीवी को पता चला तो घर में मचा ग़दर
बीवी ने कहा इतनी भी मरने की क्या जल्दी थी
पहले बच्चो की फीस और बिजली का बिल भर जाते
फिर आराम से मर जाते

अंत में उस ने मानी हार
क्योकि यहाँ जीने के साथ मरना भी है दुश्वार
फिर खाना खाकर बिस्तर में जा कर सो गया
सुबह उसका खेल अपने आप ख़तम हो गया
प्रणय

 

ये तो रोज़ का है …………..

देर शाम को सूट-बूट में घुमने निकला मेला
दोस्त सारे जब नहीं मिले तो चल दिया में अकेला
धुन में चलते पीछे से टकराया एक ठेला
लड़की से मिली आँख हमारी और प्यार हो गया पहला
बस क्या था फिर तो उसके पीछे जाने की ठानी
दिल को बहुत रोका मेने पर बात एक न मानी
पास में उसके चल रहे थे हट्टे-कट्टे पापा जी
उसके पास ही खड़ी हुई थी एक मोटी सी माँ जी
उसके पास खड़े होने का कुछ साहस तो जुटाया
उसी समय उसका तगड़ा सा भाई वहां पर आया
अब जैसे ही हमने थोड़ी उस पर नज़र गढ़ायी
पीछे से एक बाबा जी ने साईकल हमसे भिड़ाई
लंगड़ाते-लंगड़ाते चले अब थोड़ी सी आगे
इंतज़ार था की कब किस्मत मेरी जागे
जिस दूकान पर वो रूकती थी उसी पर हम जाते थे
जो आर्डर उसने करवाया, हम भी मंगवाते थे
पीछा करते करते उसका जेब हो गयी खाली
अब आर्डर न करना, वरना धोनी पड़ेगी थाली
और कुछ देर बाद जो उसने देखा हंस के मुड़कर
सोचा अपनी बात बन गयी इतनी देर से चल कर
उसकी तरफ देख कर हमने एक आँख मिचकाई
जैसे ही कहा उसने पापा से अपनी शामत आई
शेर जैसी ये जनता अपने ऊपर गुर्रायी
अब क्या था खड़े-खड़े ही हो गयी पब्लिक कुटाई
लंगड़ाते-लंगड़ाते हमने घर तक दौड़ लगायी
इन हसीन लड़कियों से तो हमने तौबा खाई
दुसरे दिन जो सूट-बूट में हम चले टहलने
फिर एक लड़की को देखा और पीछे लग गए चलने
पिछली बार की कहानी फिर से आज दोहराई
आदत से मजबूर है ये तो रोज़ का है भाई

प्रणय